कुछ उलझन इस तरह से है, कि सुलझ नहीं पाती,
आग एसी लगी है कि बुझै बुझ नहीं पती।
उनके इक अक्स पर आँख है ठहर जाती,
क्यूँ नींद आज कल हमैं नहीं आती?
कश्ती मैं सवार हो सेहर की तरफ़ चले थे हम,
पर दरिया का रुख मोड चुके थे हमारे सनम।
अब खुदा से ही गुज़ारिश बार बार है की जाती,
क्यूँ नींद आज कल हमैं नहीं आती?
आसान है मज़ाक बना कर उनकी बेरुखी को उडाना,
जाम का साथ भी साकी को लगता है बहाना।
अब महखानों मैं मुहबत की मह क्युँ नहीं आती,
क्यूँ नींद आज कल हमैं नहीं आती?
हर पल एक सवाल जहन मैं उठता रहता है,
इंतज़ार हमारे दिल मैं इक नासूर की तरह रहता है।
पूछ लूँ उनसे ये पर वो सामने नहीं आती,
क्यूँ नींद आज कल हमैं नहीं आती?
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You Rock, Sunil
Awesome lines …
कसम से भाई दिल में उतर गयी ये lines तो ..
“आसान है मज़ाक बना कर उनकी बेरुखी को उडाना,
जाम का साथ भी साकी को लगता है बहाना।
अब महखानों मैं मुहबत की मह क्युँ नहीं आती,
क्यूँ नींद आज कल हमैं नहीं आती?”